शुक्रवार, ६ नवम्बर २००९

Good Bye Prabhashji



हिंदी के वरिष्ट पत्रकार और राजनीतिक टिप्पणीकार प्रभाष जोशी के देहावसान की खबर दुखदाई है .... उनसे लगभग एक साल पहले जयपुर में मिलना हुआ था जब हरिश्चन्द्र माथुर लोक प्रशासन संसथान के सभागार में उनका भाषण था. वह और नामवर सिंह जी एक ही गाडी में दिल्ली से आये थे  और किसी शादी में जाने की हड़बड़ी में उसी शाम वापस लौटना चाहते थे. प्रख्यात  विद्वान कलानाथ शास्त्री जी मेरे साथ थे और ज़ाहिर था नामवर सिंह जी से अलग बैठ कर चर्चा करने का लोभ मन में था, हम लोग सभागार से निकल कर उस गेस्ट हाउस मैं चले आये जहाँ हिंदी के दोनों बेहतरीन वक्ताओं - प्रभाष जी और नामवर जी का अस्थाई डेरा था. मैंने तभी कला प्रयोजन के शायद दो नए अंक उसी दिन प्रकाशित किये थे, प्रभाषजी ने उत्सुकतापूर्वक  न सिर्फ  उन्हें  बेहद पैनी और तारीफ़ भरी निगाह से देखा बल्कि बातचीत को छोड़ कर वह चाय पीना भूल कर वहीं 'कला-प्रयोजन' के अंक पढने लगे, यह कहते हुए " भैया ! नामवरजी तुम्हारे अंक छोडेंगे नहीं, क्यों ये शायद उन्हीं के लिए तुम लाये भी हो पर मैं तो जितना संभव है, उन्हें यहीं पढ़ लेना चाहूँगा!"

मैं शर्मिंदा था, क्योंकि पत्रिकाओं की एक एक प्रति ही साथ थी!

उन्होंने तभी यह भी कह कर हमें और शर्मिंदा कर दिया : "क्या आप मेरे लेख अपनी पत्रिका मैं छाप पाएँगे, जो कला संस्कृति से सम्बंधित अक्सर नहीं होते!"

मैंने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया कि प्रकाशन मूलतः सांस्कृतिक प्रकृति का है और इतर विषय  खास तौर पर राजनीति और अर्थशास्त्र पर टिप्पणियां हम नहीं छापते....प्रभाष जी हँसे और  नामवर जी की तरफ शैतानी से देखते हुए कहने लगे "पर कला और साहित्य की राजनीति क्या कम राजनीति है ?"
खैर.... वह हमारी पहली या दूसरी मुलाकात थी, पर उनका लिखा मैं हमेशा बेहद ध्यान से पढ़ कर अक्सर उनकी विश्लेषण-क्षमता और तार्कितता के प्रति और प्रशंसा भाव में डूबता गया ..

इंदौर की वह जान और शान दोनों थे....अब जहाँ आज उन्हीं की जन्मभूमि और आरंभिक कर्मभूमि इंदौर में  प्रभाष जी का  अंतिम संस्कार किया जा रहा है, वह छोटी सी मुलाक़ात बरबस याद गई....और अपने ब्लॉग पर   एकाएक ये थोड़े से टूटे, बिखरे वाक्य भी.....
 उन्हें हमारी हार्दिक श्रद्धांजलि ...

सोमवार, १२ अक्तूबर २००९

Aap Ko Yah Jaan Kar Prasanntaa Hogee: ATTENTION ALL ARTISTS

Aap Ko Yah Jaan Kar Prasanntaa Hogee: ATTENTION ALL ARTISTS

गुरुवार, १३ अगस्त २००९

ATTENTION ALL ARTISTS




Dear Artist,

I am planning to bring out a special number of our bilingual quarterly art-journal 'Kala-Prayojan' http://kala-prayojan.blogspot.com/

featuring all known, less-known, unknown,upcoming,budding,aspirant Indian/International Artists (Painters/sculptors) (with their old as well as recent paintings). For this purpose, I am sending you the following questionnaire for consideration and response. Should I hope that you would be kind enough to go through it thoroughly. By replying suitably at your earliest convenience and thus helping our research team to publish significant material about you and your paintings, we sincerely hope to spread the message of global friendship through Art.

Regards,

Hemant Shesh

QUESTIONS FOR ARTISTS

1. Where did your schooling in Art take place? or you have picked up painting on your own. How did you incline towards fine arts?

2. As a student of Art, who were your contemporaries, who later became renowned artists?

3. Who were your teachers during your studies ? Did anyone/some ones did inspire your work at the initial stage as a student artist.

4. What were the major difficulties that you faced during becoming an artist and later while establishing yourself as a visual artist-in your country and then abroad.

5. Can you classify certain important significant landmarks in your long art-journey?

6. Who are the major artists, who have inspired you or your work and why?

7. Your paintings are a blend of inspirations gathered from various sources. Which culture has a greater impact on your art and why?

8. Do you wish to be underlined as a creative artist using 'multi-media' for your various forms of expression. What has to be your central concern when you take up multi-media experimention for your works? What is the significance of being experimental while working multi-media?

10. In many series of paintings some artists have blended the images of the East to those of the West, What should have been the thereof and how it bridges the occidental and oriental sensibilities??

11. Are you aware of the contemporary Art in India? What major difference do you feel between the Indian art scene today as compared to the contemporary art world of West?

12. Taking a global view of modern world-art, how do you rate major Indian artists and their art? Who are the Indian artists whose works you are familiar with?

13. Public-Art as an urbanization trend is picking up gradually in developing countries like India. What should be its aesthetic direction and dimensions? How the modern art can works literate common men's vision towards life and art?

14. What is your assessment about the recent boost in art-market of the world? Has this trend negatively influenced artists or the orientation of contemporary art. Are they becoming more and more 'commercial' insted of being professional?

15. How persons other than art-field have inspired your work and who are the chief personalities of philosophical, intellectual, literary and allied fields who have contributed to the shaping of your creative orientation?

16. What in your opinion is the creative correlation between tradition and modernity? Have some of your works given an evidence of such a co-existence?

17. What is the meaning of being an Indian near you, when for the past so many decades you are staying permanently outside India? Do you sometimes miss India and for what reasons? (This Question is addressed to Non Residential Indian Artists living abroad)

18. What is the latest that you are working on and when is your next solo/group show(s) scheduled and where?

19. Have you to say anything special on governmental patronage of fine arts, especially with reference to art institutions established for protection, Promotion and development of art and artists?

20. Have you to say anything or to show anything significant to your senior/ contemporary/budding / upcoming generation of new artists? please append choisest of your 8 recent works for consideration of publication.

दुनिया मैत्री से भरी हो इसलिए.....





मैंने इधर अखबार पढ़ना लगभग छोड़ सा दिया है : खून-खराबा, मार-काट, बलात्कार, गोलीकांड, ठगी , तस्करी , अवैध सम्बन्ध, देह-शोषण, अपहरण, आगजनी....


क्यों न हम दिन की शुरूआत प्रेम और मैत्री से करें?

http://rootsandwings.ning.com/ नाम का लिंक देखें: आप को बुरा नहीं लगेगा, अंतर्राष्ट्रीय कलाकारों से सीधे संवाद में.... और यह दिन की सार्थक शुरुआत के लिए बेहतर विकल्प है : अखबार से बड़ा!

गुरुवार, ६ अगस्त २००९

ज्योतिस्वरूप का जाना

भारतीय आधुनिक कला में अक्सर राजस्थान के चित्रकारों के योगदान को अलक्षित ही किया जाता रहा है और यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि ज्योतिस्वरूप जिनका कल निधन हुआ, कला की इसी ओछी राजनीति के शिकार थे । वह सच्चे अर्थ में राजस्थान के पहले और मौलिक चित्रकार थेसन ६० के दशक में जब बंगाल स्कूल और यथार्थवादी कला का बोलबाला था , जोधपुर जैसी छोटी जगह से कर ज्योतिस्वरूप (१९३९-२००९) ने अपने आधुनिक सोच और नवाचार के बल पर तत्काल अपनी कला की तरफ़ सुधी समीक्षकों और प्रेक्षकों का ध्यान खींच लिया था और यह आकस्मिक नहीं था कि उनके काम की असाधारण मौलिकता से यहाँ के ही नहीं, भारतीय कला जगत तक के समकालीन कई चित्रकार बेहद प्रभावित हुए थे, जिनमे कँवल कृष्ण जैसे अपेक्षकृत वरिष्ठ कलाकर्मी भी थेदिल्ली में कुछ वक्त कँवल कृष्ण और देवयानी कृष्ण के निकट सान्निध्य में रह कर ज्योतिस्वरूप ने एक और नए माध्यम : सेरेमिक और बाटिक में महारत हासिल करते हुए कई सरकारी मंडपों और भवनों के लिए विशाल आकAar के सेरेमिक murals का निर्माण कियाशायद सन साठ और सत्तर क्दशक इस कलाकार का स्वर्णिम दौर था जब रंगों और रसायनों से निर्मित उनकी चित्र श्रंखला 'इनर जंगल' का प्रदर्शन भारत और फिलेडेल्फिया की कला दीर्घाओं में किया गयावह बेहद उत्सुक और मेहनती रचनाकार थे- माध्यम को लेकर किए गए उनके अनेक प्रयोग आज भी कला जगत में याद किए जाते हैंविज्ञानं का विद्यार्थी होने कि वजह से उन्हें रसायनों का गहरा ज्ञान था पर कोई औपचारिक डिग्री लिए बिना भी ज्योतिस्वरूप परा मनोविज्ञान, समकालीन साहित्य महत्वपूर्ण लेखन के अध्येता थे केवल वह taaza किताबों के बारे में गहरी दिलचस्पी रखते थे बल्कि अपने पडौस की किताबों की एक बड़ी दूकान से मुफ्त किताबें लाकर पढ़ पाना उनका विशेषाधिकार था क्यों कि बुक्स एंड बुक्स के मालिक सिंघवी भी मूलतः उसी जगह के थे जहाँ के ज्योतिस्वरूपअपने अन्तिम दिनों और वर्षों में वह घोर आर्थिक कठिनाई में रहे और केंद्रीय ललित कला अकेडमी की fellowship के अलावा उनके पास नियमित आमदनी का कोई स्रोत नहीं था पर एक अलबेले, संघर्षरत, अकेले, एकांतवासी और हर तरह से अकेले हो चुके ज्योतिस्वरूप अपने अन्तिम वक्त तक रचनाशील बने रहेमुझे याद है उन पर 'कला प्रयोजन' में मैंने लंबा आलेख लिखा था और उनके कई चित्र भी हमने प्रकाशित किए थे, जहाँ जहाँ अवसर मिला हम मित्र उनकी कला की अप्रतिमता की चर्चा भी सादर करते थे, पर क्रमशः उनसे मिलने के अवसर कम होते चले गएगोष्ठियों में जाना भी उन्होंने छोड़ diya tha , पर मेरे दफ्तर वह कई baar जाया करते थे

आज जब ज्योति स्वरुप जैसे कलाकार अपनी मौलिकता और सृजनात्मकता के बावजूद कला जगत की मुख्यdhaaraa से बाहर कर दिए गए हैं , मुझे पता नहीं शिखंडियों और दुर्योधनों से भरे इस कला मंच का क्या अंजाम होगा क्यों कि हम अपने बड़े और महत्वपूर्ण कलाकर्मियों की उपेक्षा कर के हम अपनी कला की अवमानना ही तो कर रहे होते हैंमें जल्दी ही अपने ब्लॉग पर उनकी चित्रकला के बारे में vistaar से लिखना कहूंगा.

गुरुवार, २३ जुलाई २००९

प्रगतिशील लेखक संघ के लिए एक कवितानुमा जानकारी







यहाँ तीस नागा साधुओं ने जीवित भू-समाधि ली थी ठीक दो सौ अडसठ साल पहले लोग कहते हेँ इस मन्दिर के हर पूर्णिमा को सात बार परिक्रमा करके यहाँ से दो सौ इक्यावन गज दूर बने प्राचीन कुंड में नहाने से पुराने से पुराना चर्म-रोग ठीक हो जाया करता है यह मन्दिर पुत्र-प्राप्ति के उपलक्ष्य में बनवाया गया था जहाँ की बावडी के पास शनिचर जी महाराज की छः सौ साल पुरानी सवा हाथ बड़ी मूर्ति है जिसके आगे खेत जोतते वक्त हल की ठोकर से निकला था नीलम का दो फुट ऊंचा वही शिवलिंग जिसकी पूजा एक हज़ार साल से राजगढ़ के किले वाले मन्दिर में होती आई है कोतवाली वाले भैरों जी की उधर बड़ी मान्यता है क्यों की भानगढ़ के पुराने किले से लेकर इसी मन्दिर तक जहाँ आप अभी खड़े हैं एक लाबी भूमिगत सुरंग थी जो बाद में अंग्रेजों ने बंद करा दी और जहाँ बुधवार के दिन दाहिनी सूंड वाले गणेश जी को न्योतने आज भी दंडवत 'पर्कम्मा' करते हुए कोई दो सौ लोग तो आए ही हैं ठीक इसी जगह के पास सदियों से मेघनाद का पुतला घास फूस और मिट्टी से बनाते थे यहाँ के कुम्हार जिसे ठाकुर साब का हाथी गिराया करता था विजय दशमी के दिन फाजूजी की धर्मशाला है ये जहाँ घरेलू जानवरों को धोक दिलवाने के लिए रोगमुक्त हो जाने पर लाया जाता है यहीं पीपल के पास प्रेत बाधा दूर होती है और काले कम्बल वाले फ़कीर बाबा की मजार पर हर शुक्रवार को औरतों का साप्ताहिक मेला भी भरता है चमत्कारी बरगद का ये बड़ा पेड़ देख रहें हैं आप चरों तरफ़ मान्यता मांगने के लिए लपेटे गए उन हजारों धागों की तरफ़ निगाह डालिए जिस बरगद के किनारे बालाजी का ये मन्दिर है वहीं धर्मशाला के कुँए में राम जी का नाम लेकर फेंके गए पत्थर भी पानी पर तैरते हैं महाराजशाम की आरती के बाद मौली बाँध कर इस पेड़ के ग्यारह चक्कर लगाइए पुराना पीलिया अपने आप ठीक हो जाएगावहां मन्दिर की इस शिला के नीचे लेटने से औरतों को माहवारी की पुरानी से पुरानी समस्या से छुटकारा मिलता हैवराह अवतार का चबूतरा और उसके पास वो देखिये रोजगारेश्वर महादेव जी का पुराना मन्दिर जहाँ हर अमावस्या की रात एक इच्छाधारी नाग आता है तालाब के किनारे वो जो भैरों जी की मूर्ति है वो भी कम चमत्कारी नहींपरुशुराम बाबा की समाधि के पास जिसके ऊपर बनी छतरी नमक का व्यापार करने वाले डीडवाना के बंजारों ने बनवाई थीइसे नाहर भाता भी कहते हैं क्यों की शिवानन्द जी महाराज ने यहीं पर एक शेर को बकरी की तरह मन्दिर के उस khambhe से से बाँध दिया था अपने तंत्र के ज़ोर परशेर की वो मूर्ति अब गंगासहाय जी के गाँव वाले मन्दिर में अब भी देख सकते हैं आपजहाँ चावंड माता की जोत पिछली सदी से आज भी जल रही है और रोज़ का कोई एक डेढ़ सेर देसी घी आरती और धूनी में लगता है देने वाले भी श्रीनाथजी और पाने वाले भी श्रीनाथजीवाह सब भगवान् की ही माया हैरामदेव जी के चबूतरे की तो आपने बात ही नहीं की .....पहले बच्चे के बाल यहीं पर दिए जाते हैं और सांप काटने पर दूर दूर से मरीजों को यहीं लाया जाता हैचरण पहाडी के ऊपर पांडवों की गुफा है जिसमें चार महीने गुप्त प्रवास किया था उन्होंने....उस जगह एक शिव मन्दिर और है जहाँ की जलहरी का पानी कहाँ जाता है कोई जानता तक नहीं!बावडी के पीपल के आगे महावतों की तराई के पास मनसा माता की ये मूर्ति ज़मीं से अपने आप निकली थी /













Extracted from D P Agrawal's blog' JOG LIKHEE'
इधर कुछ वर्षों में ईश्वर विषयक अनेक पुस्तकें आई हैं. नास्तिक लेखकों जैसे सेम हैरिस, रिचार्ड डॉकिंस, क्रिस्टोफर हिचेंस ने लगभग बेबाक शब्दों में कहा है कि अगर आप ईश्वर के प्रति अनास्थावान नहीं हैं तो आप नशेड़ी हैं. हैरिस ने तो अपने एथीस्ट मेनिफेस्टो (प्रथम प्रकाशन 2005) में साफ कहा है कि “धार्मिक मध्यमार्गियों का यह कहना कि कोई विवेकवान इंसान सिर्फ इसलिए ईश्वर में भरोसा कर सकता है कि यह भरोसा उसे सुख प्रदान करता है, बेहूदा है.” इसी क्रम में हाल ही में आई मार्क्सवादी चिंतक टेरी ईगलटन की नई किताब रीज़न, फेथ, एण्ड रिवोल्यूशन: रिफलेक्शंस ऑन द गॉड डिबेट भी बहुत चर्चा में है. लेकिन आज हम एक और किताब की चर्चा कर रहे हैं. रॉबर्ट राइट अपनी ताज़ा किताब द इवोल्यूशन ऑफ गॉड में इस बहस में नहीं उलझते है कि ईश्वर है या नहीं है. हालांकि वे ईश्वर का होना सिद्ध करने के लिए उसकी तुलना वैज्ञानिकों की दुनिया के इलेक्ट्रॉन से करते हैं और कहते हैं कि इलेक्ट्रॉन को भी तो हममें से किसी ने नहीं देखा है, लेकिन दुनिया पर पड़ने वाले उसके प्रभावों के कारण उसके अस्तित्व को स्वीकार करते हैं. यही बात ईश्वर के बारे में भी है. ईश्वर के प्रभावों के रूप में वे सत्य और प्रेम का नाम लेते हैं. राइट मूलत: एक पत्रकार हैं और विकासवादी मनोविज्ञान के विशेषज्ञ हैं. उनकी पिछली किताब नॉनज़ीरो: द लॉजिक ऑफ ह्युमन डेस्टिनी बहु चर्चित रही है.राइट इस किताब में हमें एक ऐतिहासिक यात्रा पर ले जाते हैं और यह बताते हैं कि ईश्वर की अवधारणा का विकास किस तरह हुआ है और उसमें समय के साथ क्या बदलाव आये हैं. राइट अपनी यह खोज यात्रा मानवीय विकास की यात्रा के समानांतर चलाते हैं. प्रारंभ के आखेट जीवी लोगों के लिए प्रकृति से भी बड़ी चीज़ थी आत्मा, कबीलाई ज़िन्दगी में बहुलदेव वाद आ गया और और उनके बहुत सारे देवता ज़िन्दगी के तमाम पहलुओं पर नियंत्रण करने लगे. लेकिन, राइट बताते हैं कि इनमें से अधिकतर देवता सही जीवन के आदर्श नहीं हैं. ये सनकी और क्रूर भी हैं. कालांतर में इन देवताओं की जगह देवताओं की एक आधिपत्य पूर्ण व्यवस्था ने ले ली जिसमें एक सर्वशक्तिमान ईश्वर सबका प्रभारी होने लगा, और इसके बाद एक ऐसी व्यवस्था बनी जिसमें नगर-राज्यों में सिर्फ एक ईश्वर की उपासना होने लगी, बग़ैर यह स्वीकार किए कि वही एकमात्र ईश्वर है, हालांकि उसे अन्य ईश्वरों से बेहतर ज़रूर माना जाता था.राइट बलपूर्वक कहते हैं कि तीन प्रमुख अब्राहमी धर्मों के धर्मग्रंथ वास्तविक व्यक्तियों के द्वारा लिखे गए हैं और उनका मक़सद था आर्थिक, सामाजिक और भौगोलिक सुधार करना. कालांतर में जैसे-जैसे समाजों का विकास होता गया, और वे अधिक जटिल और वैश्विक होते गये, ईश्वर की अवधारणा भी बदलती गई और समाजों की उससे अपेक्षा भी अधिक नैतिक होती गई. राइट इसी बात को आगे बढाते हुए ईश्वर और धर्म की अवधारणा को इसलिए पसंद करते हैं कि इनसे हमारी ज़िन्दगी का अनुकूलन होता है, हम अच्छे और बुरे में अंतर करते हैं और जीवन के सुख दुख को सम दृष्टि से देखना सीखते हैं. किताब का बहुलांश एकेश्वरवादी सम्प्रदायों जैसे हिब्रू, इसाई बाइबिल और क़ुरान शरीफ के इर्द- गिर्द ही है. स्वाभाविक ही है कि राइट बाइबिल का विश्लेषण अधिक विस्तार से करते हैं. भारतीय सन्दर्भ में किताब की एक बड़ी सीमा यह नज़र आती है कि यह हिन्दु और बौद्ध धर्मों को स्पर्श ही नहीं करती. और यह भी कि हमारे यहां यह स्वीकार करना मुश्क़िल लगता है कि हम सब एक सहकारी किस्म के एकेश्वरवाद की तरफ अग्रसर हो रहे हैं. बौद्ध लोग जहां अपने धर्म में किसी देवी-देवता की ज़रूरत ही महसूस नहीं करते, वहीं हिन्दु 36 करोड़ देवी देवताओं को भी कम मानते हैं. लेकिन इस सबके बावज़ूद जब राइट यह उम्मीद करते हैं कि सब कुछ के बावज़ूद दुनिया के लोग शांति से रह सकते हैं, और इसके लिए वे अब तक के बदलावों को प्रमाण के तौर पर पेश करते हैं, तो उनसे असहमत होने का मन नहीं करता.
Discussed book:Let’s Talk About GodBy Robert WrightPublished by Little, Brown and CompanyHardcover, 576 pagesUS $ 25.99

मंगलवार, ३० जून २००९

अखिलेश सहसंपादक 'अकार' ने कहा


पिछले दिनों भारत भवन भोपाल की एक गोष्ठी में, जिसमें हमारे स्वनामधन्य साहित्यकार हेतु भारद्वाज भी शरीक थे, में एक प्रगतिशील lekhak संपादक अखिलेश ने कहा की इमर्जेंसी के दौरान किसी माई के लाल प्रगतिशील लेखक ने आपत्काल की ज्यादतियों का हल्का सा भी विरोध नहीं किया था...... क्या आप लोग इस बात पर कुछ कहना नहीं चाहेंगे?


-हेमंत शेष

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बुधवार, २४ जून २००९

हिन्दी की लघु पत्रिकाएं और हमारे दयित्व





इलेक्ट्रोनिक मीडिया के विस्तार और इसकी दिनों दिन बढ़ती लोकप्रियता के अलावा नयी पीढी में छपे हुए अक्षर के प्रति अवज्ञा भाव ने हमारी साहित्यिक पत्रकारिता को चिंता में डाला है । साहित्य मात्र के प्रति नौजवानों की अरुचि गंभीर आत्मचिंतन के लिए एक सवाल के सामने हमें सब को खड़ा करती है : खास तौर पर उन संपादकों को जो छोटी साहित्य पत्रिकाओं के संपादन से जुड़े हुए हैं!
सवाल ये है कि इस कठिन परिदृश्य के चलते क्या हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता एक उच्चतर मिशन की बजाय एक यशविहीन उपक्रम बन कर रह जाने वाली है ?
'कला-प्रयोजन' के आगामी अंक में, जो ५१ है, हम हिन्दी की कुछ महत्वपूर्ण पत्रिकाओं के संपादकों की अपनी दृष्टि में हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता के अपने अनुभव और छोटी पत्रिकाओं के अर्थशास्त्र पर उनकी चिंताओं को समेटने वाले कई लेख बहुत जल्दी छपने जा रहे हैं, उम्मीद है सामग्री ठीक थक बन जायेगी। अगर आप कला-प्रयोजन पढने के इच्छुक हों तो मुझे मेल करें : hemantshesh@gmail.com या हमारे निम्नांकित लिंक्स में से किसी पर भी लिख डालें :

http:// जगह jaisee जगह.blogspot.कॉम/
http://hemantshesh.blogspot.कॉम/
(अपूर्ण)

शुक्रवार, ५ जून २००९

उडीसा यात्रा के दौरान लिए गए चित्र
















मार्च से मई के बीच लगातार उडीसा जाना होता रहा। देश के इस भूभाग की अपनी खूबसूरती है और इसके अपने दुःख। अभाव और गरीबी का तांडव जितना वहां है शायद और कहीं नहीं । पर कलिंग प्रदेश अपनी तरह की एक अजीब सुन्दरता समेटे हुए है। क्या पता ये चित्र हमारे देश के एक बेहद सम्भावना भरे राज्य के भविष्य की और संकेत करते हों ! कालाहांडी का चेहरा भी अब बदल रहा है ! एक ज़माने में यह अपनी दरिद्रता के लिए इतना कुख्यात था की बस पूछिए मत! माओवाद यहाँ की एक और समस्या है : यह जितनी राजनैतिक है, उस से ज्यादा आर्थिक-सामाजिक, पर इधर नए केंद्रीय कानून से क्या पता उडीसा को भी जल्दी छुटकारा मिल जाए और यहाँ के सीधे भले लोग विकास की मुख्यधारा से जुड़ जायें!
















बुधवार, १३ मई २००९

कैसा सुंदर नाचती है मैत्रेयी : प्रत्यक्षा की एक ताज़ा नई कहानी












कमल के विशाल फूल के अंदर चुकुमुकु बैठे बस एक चिंता थी । बडी गहरी चिंता । ये जो सफेद कपडे पहन रखे थे , सफेद मोज़े सब पर कमल के फूल का गुलाबी गेरुआ रंग लकीरें खींच रहा था । कल कुकी और बेबी को कैसे दिखाऊँगी ये झक्क सफेदी । बाहर संगीत बज रहा था । अगली पंक्ति के बाद झन्न से करताल बजेगा फिर ढोलक की थाप और फूल खुलने लगेगा । मुझे सिर्फ मुस्कुराते हुये हाथ को सर के ऊपर सटाये खडे हो जाना था । लेकिन अचानक लगा कि पैर इतनी देर में सुन्न से हो गये । ओह ! कैसे खडी होऊँगी । कहीं गिर न जाऊँ । माँ ने क्या कहा था , पैर सुन्न हो जाते हैं तब उँगलियाँ मोडो , हिलाओ और उस दुष्ट बेबी के भाई ने चिढाते हुये कभी कहा था कौन सी लाईन दोहराओ तो सुन्न अंग जागने लगता है । जैसे हम नीद से जागते हैं ।
लेकिन अभी तो बेबी के शैतान भाई का चेहरा तक ठीक से याद नहीं । किसी दूर बहुत दूर स्कूल में रहता था । छुट्टियों में आता तो सबकी शामत आती । पर कैसे मज़े के किस्से सुनाता । और रात को भूत की कहानी । सटे हुये छत पर गर्मी के दिनों में कतार से चौकी लगती । पानी से छत पर छिडकाव होता । कैसे हिस्स की आवाज़ से दिन भर की चटक धूप की गर्मी भाप बन कर उड जाती । ठंडी सफेद चादर बिछती । गावतकिये और किस्म किस्म के तकिये , कडे , ढीले , लुंजपुंज तकिये के नाम पर कलंक । फिर चौकी के दोनों ओर बांस की कमानी को क्रॉस करके मसहरी लगती । रात की सफेद चाँदनी रौशनी में एक कतार से सफेद बिछे इंतज़ार करते बिस्तरे । मुंडेरे के पार सुनील की कहानियाँ शुरु होतीं । धीमी फुसफुसाती भर्रायी आवाज़ में स्वर के नाटकीय उतार चढाव पर तैरते बिछलते रात के अँधेरों में भूत और पिशाच हवाओं में डोलते । हम चिहुंक चिहुंक डरे मुड कर देखते अपने पीठ पीछे , कोई है तो नहीं । पीठ पर कंधों की हड्डियों के बीच डर सुरसुराता जैसे कनगोजर । डर के कितने पाँव होते । गर्दन पर के रोंये किसी भयभीत आशंका में सिहर कर खडे हो जाते । डर का स्वाद भी कैसा रोमांचक होता । और हम सब मंत्रमुग्ध सम्मोहित बँधे रहते , भागने न भागने के बीच , सुनने न सुनने के बीच , बँधे हुये कठपुतलियाँ । फिर किसी माँ चाची की डाँट कडकडाते हुये झन्न से शीशे को तोड देती और हम सब सिटपिटाये चिंटियों की तरह अफरा तफरी में तितर बितर हो जाते । पर अगली रात सुनील की फुसफुसाती आवाज़ उस पार से तैरती आती
आज नहीं सुनना क्या ?
मजमा फिर तुरत जमता । ये सब चोरी किये हुये पल थे । कब जाने कौन बडा आकर रात का ये अबूझ जादू भेड देता ।
उफ्फ पर अभी तो मुडे हुये पैर जान ले रहे थे । उस कमबख्त सुनील ने क्या बताया था । फूल खुलते ही कहीं गिर न जाऊँ । आगे की कतार में माँ , बाबा बैठे होंगे । ओह माँ क्या मंत्र जाप करती थी बिगडे काम सुधारने के लिये । अभी कुछ भी क्यों याद नहीं आ रहा । गाने का अंतिम स्टैंज़ा चल रहा था । वो पागल मल्लिका कितना सुंदर तो तैयार हुई थी । लाल लहंगा पर हाय कैसी पतली सलमा सितारे वाली गोटे किरण वाली ओढनी । चेहरे पर चंदन की बुंदकियाँ भौंहों के ऊपर , गालों पर लाली और होठों पर भी । और कैसे सुंदर गहने चम चम चमकते । पाँवों के घुंघरू कैसे छम छम बोलते । काश मल्ली वाला नाच उसके हिस्से पडता । कितना तो इतराती थी जब सुतपा बहन जी ने उसे चुना था इस नाच के लिये । जरूर उसके गोरे रंग पर चुना होगा वरना तो मैं उससे अच्छी ल्गती हूँ । नहीं शायद वो ही ज्यादा अच्छी है । कितना तो देखा था आईने के सामने खडे हो होके । कितनी बार साबुन से मुँह धोया था , दीदी की क्रीम भी छुप छुप के लगाई थी पर ज़रा सा भी असर कहाँ पडा था ।
सुतपा बहन जी ने कहाँ मल्लिका को हटा कर उस मेन डांस के लिये उसे चुन लिया था । कितनी बार बिस्तर में आँखे धँसाये कल्पना की थी सुतपा बहन जी अपनी कडकडाती फडफडाती ताँत की लाल धारियों वाली साडी में तेज़ तेज़ आयेंगी । कहेंगी , अपने माथे पर हाथ मार के , की कोरी आमी ? एई जे मल्लिका , तुमी किछु सीखने पाडेगा नेई । फिर इशारा करेंगी उसकी तरफ , तुमी आओ । बाँह पकड के ठीक बीच में कर देंगी । फिर किनारे से ताल से हाथ के थाप देकर शुरु करायेंगी । और मेरे शरीर में लय रच बस जायेगा । मेरे डंडे से हाथ पाँव किसी जंगली लता से हवा में लहरायेंगे । मेरा शरीर कैसे लोच खायेगा । और सुतपा बहन जी कितना मंत्र मुग्ध देखेंगी ।
ये देखो कैसा सुंदर नाचती है मैत्रेयी । मल्लिका तुमी कोभी सीखती पाडेगा नेई ।
मल्लिका सिर झुका लेगी और मैं ? मैं अपने काल्पनिक लहंगे के घेर सी झूम झूम जाऊँगी ।
“क्या दिन दहाडे बिस्तर में सर गोते पडी है ? उठ “ की माँ की ऐसी निर्मम गुहार मेरे कितने दिवास्वपनों पर झाडू फेर गई है । लेकिन बावज़ूद कितनी शिद्दत के ऐसा सोचने के , मुख्य नर्तकी मल्लिका ही रही और मैं पूरे नृत्य नाटिका में उस विशाल कमल के फूल में कैद तितली । ऐसी तितली जो अब सुतपा बहन जी की भद्द करायेगी जब फूल खुलते ही लंगडाई तितली भद्द से गिर जायेगी । ओह कितना मर्मांतक होगा ये दृश्य । आने वाले अपमान से चेहरा दहकने लगा ।
ओ काली कलकत्ते वाली तेरा वचन न जाये खाली
रात में सोते वक्त पक्का विश्वास हुआ कि ऐन वक्त पर अगर ये जाप याद न आ गया होता तो सब भडभीस हुआ होता । लेकिन ऐसा नहीं होना था सो ऐन वक्त याद आ गया और तीन बार जाप पूरा होते ही , ठीक तीन बार , कमल का फूल ढोलक के थाप पर खुला और मैं मुस्कुराते हुये खडी हुई । मेरे चमकीले पँख साबुत सलामत रहे । मेरे पैर बिना हिले थरथराये टिके रहे । तीन मिनट तीन साल जैसे । पर पर्दा गिरने तक मैं स्थिर खडी रही तेज़ लाईट की दमकती रौशनी में , स्टेज पर के धूम धडाके में , संगीत के शोर में , कोने के प्रज्जवलित दीपशिखा के घूमते तन्द्रिल धूँये में , दर्शकों की कतार की कतार के चुप्पी के सामने । जैसे सब कुछ फट पडने को बेताब हो । मेरा शरीर भी ।

एक ताज़ा कहानी प्रत्यक्षा की कलम से

कैसा सुंदर नाचती है मैत्रेयी । कमल के विशाल फूल के अंदर चुकुमुकु बैठे बस एक चिंता थी । बडी गहरी चिंता । ये जो सफेद कपडे पहन रखे थे , सफेद मोज़े सब पर कमल के फूल का गुलाबी गेरुआ रंग लकीरें खींच रहा था । कल कुकी और बेबी को कैसे दिखाऊँगी ये झक्क सफेदी । बाहर संगीत बज रहा था । अगली पंक्ति के बाद झन्न से करताल बजेगा फिर ढोलक की थाप और फूल खुलने लगेगा । मुझे सिर्फ मुस्कुराते हुए हाथ को सर के ऊपर सटाये खडे हो जाना था । लेकिन अचानक लगा कि पैर इतनी देर में सुन्न से हो गये । ओह ! कैसे खडी होऊँगी । कहीं गिर न जाऊँ । माँ ने क्या कहा था , पैर सुन्न हो जाते हैं तब उँगलियाँ मोडो , हिलाओ और उस दुष्ट बेबी के भाई ने चिढाते हुये कभी कहा था कौन सी लाईन दोहराओ तो सुन्न अंग जागने लगता है । जैसे हम नीद से जागते हैं । लेकिन अभी तो बेबी के शैतान भाई का चेहरा तक ठीक से याद नहीं । किसी दूर बहुत दूर स्कूल में रहता था । छुट्टियों में आता तो सबकी शामत आती । पर कैसे मज़े के किस्से सुनाता । और रात को भूत की कहानी । सटे हुये छत पर गर्मी के दिनों में कतार से चौकी लगती । पानी से छत पर छिडकाव होता । कैसे हिस्स की आवाज़ से दिन भर की चटक धूप की गर्मी भाप बन कर उड जाती । ठंडी सफेद चादर बिछती । गावतकिये और किस्म किस्म के तकिये , कडे , ढीले , लुंजपुंज तकिये के नाम पर कलंक । फिर चौकी के दोनों ओर बांस की कमानी को क्रॉस करके मसहरी लगती । रात की सफेद चाँदनी रौशनी में एक कतार से सफेद बिछे इंतज़ार करते बिस्तरे । मुंडेरे के पार सुनील की कहानियाँ शुरु होतीं । धीमी फुसफुसाती भर्रायी आवाज़ में स्वर के नाटकीय उतार चढाव पर तैरते बिछलते रात के अँधेरों में भूत और पिशाच हवाओं में डोलते । हम चिहुंक चिहुंक डरे मुड कर देखते अपने पीठ पीछे , कोई है तो नहीं । पीठ पर कंधों की हड्डियों के बीच डर सुरसुराता जैसे कनगोजर । डर के कितने पाँव होते । गर्दन पर के रोंये किसी भयभीत आशंका में सिहर कर खडे हो जाते । डर का स्वाद भी कैसा रोमांचक होता । और हम सब मंत्रमुग्ध सम्मोहित बँधे रहते , भागने न भागने के बीच , सुनने न सुनने के बीच , बँधे हुये कठपुतलियाँ । फिर किसी माँ चाची की डाँट कडकडाते हुये झन्न से शीशे को तोड देती और हम सब सिटपिटाये चिंटियों की तरह अफरा तफरी में तितर बितर हो जाते । पर अगली रात सुनील की फुसफुसाती आवाज़ उस पार से तैरती आती
आज नहीं सुनना क्या ?
मजमा फिर तुरत जमता । ये सब चोरी किये हुये पल थे । कब जाने कौन बडा आकर रात का ये अबूझ जादू भेड देता ।
उफ्फ पर अभी तो मुडे हुये पैर जान ले रहे थे । उस कमबख्त सुनील ने क्या बताया था । फूल खुलते ही कहीं गिर न जाऊँ । आगे की कतार में माँ , बाबा बैठे होंगे । ओह माँ क्या मंत्र जाप करती थी बिगडे काम सुधारने के लिये । अभी कुछ भी क्यों याद नहीं आ रहा । गाने का अंतिम स्टैंज़ा चल रहा था । वो पागल मल्लिका कितना सुंदर तो तैयार हुई थी । लाल लहंगा पर हाय कैसी पतली सलमा सितारे वाली गोटे किरण वाली ओढनी । चेहरे पर चंदन की बुंदकियाँ भौंहों के ऊपर , गालों पर लाली और होठों पर भी । और कैसे सुंदर गहने चम चम चमकते । पाँवों के घुंघरू कैसे छम छम बोलते । काश मल्ली वाला नाच उसके हिस्से पडता । कितना तो इतराती थी जब सुतपा बहन जी ने उसे चुना था इस नाच के लिये । जरूर उसके गोरे रंग पर चुना होगा वरना तो मैं उससे अच्छी ल्गती हूँ । नहीं शायद वो ही ज्यादा अच्छी है । कितना तो देखा था आईने के सामने खडे हो होके । कितनी बार साबुन से मुँह धोया था , दीदी की क्रीम भी छुप छुप के लगाई थी पर ज़रा सा भी असर कहाँ पडा था ।
सुतपा बहन जी ने कहाँ मल्लिका को हटा कर उस मेन डांस के लिये उसे चुन लिया था । कितनी बार बिस्तर में आँखे धँसाये कल्पना की थी सुतपा बहन जी अपनी कडकडाती फडफडाती ताँत की लाल धारियों वाली साडी में तेज़ तेज़ आयेंगी । कहेंगी , अपने माथे पर हाथ मार के , की कोरी आमी ? एई जे मल्लिका , तुमी किछु सीखने पाडेगा नेई । फिर इशारा करेंगी उसकी तरफ , तुमी आओ । बाँह पकड के ठीक बीच में कर देंगी । फिर किनारे से ताल से हाथ के थाप देकर शुरु करायेंगी । और मेरे शरीर में लय रच बस जायेगा । मेरे डंडे से हाथ पाँव किसी जंगली लता से हवा में लहरायेंगे । मेरा शरीर कैसे लोच खायेगा । और सुतपा बहन जी कितना मंत्र मुग्ध देखेंगी ।
ये देखो कैसा सुंदर नाचती है मैत्रेयी । मल्लिका तुमी कोभी सीखती पाडेगा नेई ।
मल्लिका सिर झुका लेगी और मैं ? मैं अपने काल्पनिक लहंगे के घेर सी झूम झूम जाऊँगी ।
“क्या दिन दहाडे बिस्तर में सर गोते पडी है ? उठ “ की माँ की ऐसी निर्मम गुहार मेरे कितने दिवास्वपनों पर झाडू फेर गई है । लेकिन बावज़ूद कितनी शिद्दत के ऐसा सोचने के , मुख्य नर्तकी मल्लिका ही रही और मैं पूरे नृत्य नाटिका में उस विशाल कमल के फूल में कैद तितली । ऐसी तितली जो अब सुतपा बहन जी की भद्द करायेगी जब फूल खुलते ही लंगडाई तितली भद्द से गिर जायेगी । ओह कितना मर्मांतक होगा ये दृश्य । आने वाले अपमान से चेहरा दहकने लगा ।
ओ काली कलकत्ते वाली तेरा वचन न जाये खाली
रात में सोते वक्त पक्का विश्वास हुआ कि ऐन वक्त पर अगर ये जाप याद न आ गया होता तो सब भडभीस हुआ होता । लेकिन ऐसा नहीं होना था सो ऐन वक्त याद आ गया और तीन बार जाप पूरा होते ही , ठीक तीन बार , कमल का फूल ढोलक के थाप पर खुला और मैं मुस्कुराते हुये खडी हुई । मेरे चमकीले पँख साबुत सलामत रहे । मेरे पैर बिना हिले थरथराये टिके रहे । तीन मिनट तीन साल जैसे । पर पर्दा गिरने तक मैं स्थिर खडी रही तेज़ लाईट की दमकती रौशनी में , स्टेज पर के धूम धडाके में , संगीत के शोर में , कोने के प्रज्जवलित दीपशिखा के घूमते तन्द्रिल धूँये में , दर्शकों की कतार की कतार के चुप्पी के सामने । जैसे सबकुछ फट पडने को बेताब हो । मेरा शरीर भी ।

मंगलवार, ५ मई २००९

दुर्गाप्रसाद अग्रवाल का दुःख अपनी जगह बिल्कुल ठीक है


अपने मित्रों का लिखा पढ़ना ,खास तौर पर अपने प्रिय लेखकों को कहीं भी पढ़ना सुखद होता है। अभी दुर्गाप्रसाद अग्रवाल का यात्रा वृत्त पढ़ा और जब उन्हें अपनी प्रतिक्रिया भेजी तो अमेरिका से मुझे मिली उनकी ये मेल :

"जब ये टिप्पणियां लिख रहा था तो मन में ऐसे ही कुछ विचार थे. मुझे हमेशा लगता है कि व्यावसायिकता बुरी ही नहीं होती, अच्छी भी होती है. यहां, पराये देश में घूमना सदा बेहतर अनुभव देता है, जबकि अपने देश में घूमते हुए हमेशा डर लगता रहता है। पर्यटन विभाग की उदासीनता और दृष्टि हीनता अपनी जगह है, और तमाम पर्यटन स्थलों पर पर्यटक को एक ही बार में लूट लेने की मानसिकता, दुर्व्यवहार, शिष्टता का अभाव, गन्दगी - ये सब चीज़ें बहुत आहत करती हैं। पिछले दिनों हम लोग बेटे बहू के साथ आमेर गए थे. वो जो पीछे से एक रास्ता है, कार वाला, उस रास्ते से. अगर किसी ने नरक न देखा हो तो एक बार उस रास्ते से गुज़र जाए. यह तमन्ना भी पूरी हो जाती है.. हमारे राज्य और शहर का सबसे नामचीन पर्यटन स्थल है आमेर, और वहां तक पहुंचने का रास्ता! हे राम! क्या किसी को भी यह नज़र नहीं आता? न पर्यटन विभाग को, न सरकार को, और न उन सब को जिनकी रोजी रोटी पर्यटकों की कृपा से चलती है ? जब यहां के पर्यटक स्थलों को देखते हैं तो यह सब याद आए बगैर नहीं रहता. आपने प्रतिक्रिया दी, बहुत अच्छा लगा. "

मंगलवार, २८ अप्रैल २००९

ज़मीन और आसमान के बीच





हिन्दी कथाकार और चित्रकार प्रभु जोशी का ४० से भी ज़्यादा जलरंग चित्रों का एकल प्रदर्शन मार्च २००९ में जवाहर कला केन्द्र जयपुर में आयोजित था। यह प्रदर्शनी जलरंग जैसे अपेक्षाकृत कठिन माध्यम पर चित्रकार की पकड़ और संलग्नता का प्रमाण है।
बहुत बड़े आकार में नहीं , किंतु चित्रावकाश में छोटे होते हुए भी प्रभु जोशी ( 1950) अपने रंग- बर्ताव की मौलिक रचनाशीलता से भू खंडों , भवनों, दृश्यों, और प्रकृति की जानी पहचानी दुनिया का कुछ कुछ नई तरह सामना करते हैं । उनके यहाँ पहाड़ सिर्फ़ पहाड़ नहीं, एक कहानी है । नदी, नाले, पत्थर और घर जैसे कोई कविता , जिसमें दृश्यों के पीछे और दृश्य छिपे हुए हैं। चट्टानों, दीवारों, वनस्पतियों और भवन-संरचनाओं को प्रभु जोशी ने जिस कौशल और अंतरंगता से चित्रवस्तु बनाया है, वह समकालीन सैरों, खास तौर पर जलरंग- संयोजनों के इलाके में एक नई सी घटना है, जिस बात की तरफ हमारा ध्यान बराबर जाता है, वे हैं - textures .......उनके लगभग हर काम में textures की मौजूदगी , जो जलरंग माध्यम पर कलाकर्मी के असाधारण नियंत्रण को दर्शाती है। बर्फ, लकडी, पत्थर और दीवारों के texture यहाँ अपने पुराने समूचे अकेलेपन में भी बेहद दर्शनीय हैं । यों नीला, बेंगनी और भूरा प्रभु जोशी के शायद ज्यादा प्रिय रंग हों पर इनके अलावा भी धूसर रंगतों की मौजूदगी चित्रवकाश को एक नया मर्म बराबर देती है। यहाँ प्रकाश और छाया की बहुतेरी आवृत्तियाँ हैं।

यह विविध रंगों और रंगतों का एक ऐसा सुघड़ और खूबसूरत माया लोक है जिसमें कुछ खास रंगों जैसे कहीं कहीं- लाल की उपस्थिति बेहद उत्तेजक और ध्यान खींचने वाली है। वह चित्र की प्राकृतिक द्विआयामी सीमा को त्रि-आयामी दृश्य-संभावना बनाना चाहते हैं, इसलिए मुख्य फलक पर आयी चीज़ों के अलावा उनकी दिलचस्पी पृष्ठभूमि के अंकन में - ख़ास तौर पर-मूल दृश्य के पीछे दिखती आकृतियों में भी उतनी ही गहरी है।
यहाँ भू-दृश्य, एक ऊंचे पहाड़ पर खड़े हो कर प्रकृति की सौंदर्य सत्ता को देखने की कोशिश जैसा रोमांचक ही है। रंगों के सघन इस्तेमाल के साथ फ्रेंच gwash - सफ़ेद के उपयोग में प्रभु जोशी को एक अलग महारथ हासिल है। यहाँ सफ़ेद अपनी वाचालता में बहुत मुखर होते हुए भी संयत नज़र आता है, वह दूसरे रंगों के प्रभाव भी गहरे करता है। वह समूची सरंचना को नया अर्थ और आलोक देता सफ़ेद है।
उनके चित्रों के बारे में कथाकार समीक्षक अशोक आत्रेय की यह टिप्पणी भी पढ़े जाने लायक है : " प्रभु जोशी की ये रचनाशील सीरीज़ लैंडस्केप चित्रों और मिनिएचर्स शैली को उनकी आधुनिक प्रभावशीलता में प्रस्तुत करती है । इन चित्रों में सफ़ेद रंग-परतों और अनियमित रंग चिप्पियों की वजह से अलग पहचान करवाते हैं ।"
पता नहीं चलता प्रभु जोशी का यह चित्रांकन असल में उनके कहानीकार का ही विस्तार है, या चित्रांकन उनके कहानीकार के लिए प्रेरणा - पर एक कथाकार की तरह वह अगर बार-बार हमें देखे जा चुके स्थानों , शहरों, घरों, बरामदों, मंदिरों, दालानों और जलाशयों से जोड़ते हैं, तो यों इसमें कुछ भी आकस्मिक या अनदेखा नहीं है । प्रभु जोशी पत्थर और पानी की याद बेहद अंतरंगता से करते हैं। प्रकटतः वह दृश्यों की खूबसूरती के ही चितेरे हैं और अपने चित्रों में प्रकृति के विविध मूड्स को बेहतरीन रूपाकार देने के लिए उत्सुक।
प्रभु जोशी के चित्रों की एक और याद रखने लायक बात - उनके चित्रों में मनुष्य की अनुपस्थिति है। उनका चित्रलोक रंगों रेखाओं या आकृतियों से ठसाठस भरा पूरा होने के बावजूद एक सुंदर एकांत की अनुगूंजें समेटे हुए है। इन रचनाओं में मनुष्य कहीं भी मौजूद नहीं है।

जयपुर में प्रभु जोशी की ये पहली एकल प्रदर्शनी थी । इसके तुंरत बाद प्रभु ने मुंबई में भी अपना एक और शो किया है। हमें उनकी कूची से कुछ और लगातार बेहतरीन देखते जाने की जायज़ उम्मीद बनी हुई है।

बुधवार, १५ अप्रैल २००९


विष्णु प्रभाकर: गिर गया साहित्य का एक और महावृक्ष : एक अपूरणीय क्षति
हिन्दी के वयोवृद्ध गाँधीवादी साहित्यकार विष्णु प्रभाकर का विगत शुक्रवार रात को निधन हो गया। वे 96 वर्ष के थे। पिछले कुछ दिनों से वे बीमार चल रहे थे। उनको पिछले दिनों महाराजा अग्रसेन अस्पताल में साँस लेने में तकलीफ के कारण भर्ती कराया गया था। करीब दो सप्ताह अस्पताल में रहने के बाद रात पौने एक बजे उन्होंने अंतिम साँसें लीं। विष्णु प्रभाकर का अंतिम संस्कार नहीं किया जाएगा क्योंकि उन्होंने मृत्यु के बाद अपना शरीर अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) को दान करने का फ़ैसला किया था।
उन्हें उनके उपन्यास अर्धनारीश्वर के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था। उनका लेखन देशभक्ति, राष्ट्रीयता और समाज के उत्थान के लिए जाना जाता था। उनकी प्रमुख कृतियों में 'ढलती रात', 'स्वप्नमयी', 'संघर्ष के बाद' और 'आवारा मसीहा' शामिल हैं. इनमें से 'आवारा मसीहा' प्रसिद्ध बंगाली उपन्यासकार शरतचंद्र चटर्जी की जीवनी है जिसे अब तक की तीन सर्वश्रेष्ठ हिंदी जीवनी में एक माना जाता है.
प्रभाकर को पद्म विभूषण के साथ ही हिन्दी अकादमी पुरस्कार, शलाका सम्मान, साहित्य अकादमी पुरस्कार, शरत पुरस्कार आदि कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया था। उनकी प्रसिद्ध कृतियों में अर्द्धनारीश्वर, धरती अब भी घूम रही है , डॉक्टर, सत्ता के आर-पार, मेरे श्रेष्ठ रंग, आवारा मसीहा, सरदार शहीद भगत सिंह, ज्योतिपुंज हिमालय शामिल हैं।
वह हमारी पत्रिका कला प्रयोजन के बेहद उत्सुक पाठक थे और अक्सर हर अंक पर अपने हाथ से पत्रिका की सामग्री पर अक्सर बेहद तारीफ भरी प्रतिक्रिया भेजते थे। कला प्रयोजन का सम्पादकीय परिवार इस वयोवृद्ध हिन्दी लेखक के निधन पर शोक में है और प्रभाकर जी को श्रद्धांजलि अर्पित करता है।

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HEMANT SHESH
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Nothing significant to reveal and absolutely nothing to hide. I am not even "a cloud in trousers" as Vladimir Mayakowsky, the Russian poet jokingly replied to an over inquisitive lady, the fellow passenger travelling in the same coach, on asking him " Who are you sir, and what do you do??"
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